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बुटाटी धाम में लकवा पीड़ितों की सैन समाज ने ऐसे की Help

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बुटाटी धाम नागौर राजस्थान में स्थित है। मान्यता है कि यहां लकवा पीड़ितों का इलाज होता है। ऐसे में देश-विदेश से Paralysis के मरीज यहां इलाज के लिये आते है। सैन समाज की ओर से यहां मरीजों की सेवा के लिये अनूठा काम किया गया।

नागौर।  राष्ट्रीय नाई महासभा नागौर टीम ने लकवा पीड़ितों की अनूठे ढंग से सेवा की। रविवार को बुटाटी धाम में एक कैम्प का आयोजन किया गया। इस कैम्प में नागौर टीम के सदस्यों ने लकवा पीड़ितों की फ्री में शेविंग और कटिंग की। टीम इस तरह के यहां आयोजन करती रहती है। यह 13वां निशुल्क शिविर था।

शिविर में युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष लक्ष्मण सैन, मेड़ता तहसील अध्यक्ष बबलू सैन, किशोर सैन मेड़ता रोड, विष्णु सैन मौजमाबाद, जिला महासचिव रामकुमार सैन जारोड़ा, जिला सचिव रामचन्द्र सैन, अनमोल सैन तथा अन्य सदस्यों ने अपनी सेवा दी। यह जानकारी भवानी सैन किनसरिया, प्रदेश मीडिया प्रभारी, राष्ट्रीय नाई महासभा प्रदेश राजस्थान ने दी।

कहां है बुटाटी धाम

बुटाटी धाम राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। यह स्थान राष्ट्रीय राज मार्ग 89 अजमेर रोड पर है। बुटाटी धाम के लिये जयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, जोधपुर, नागौर आदि सभी जगहों से बस सेवायें उपलब्ध है। बुटाटी में धर्मशालायें और रहने की अच्छी व्यवस्था है।

how to reach butati dham

लकवे का इलाज होता है

लकवे के इलाज के लिये बुटाटी धाम फेमस है। यहां ना राजस्थान या सिर्फ देशभर से बल्कि विदेशों से लकवा रोग से ग्रसित मरीज आते है। विश्वास है कि बुटाटी धाम पर 7 दिन तक फेरी लगाने वाला लकवा रोग से ग्रसित मरीज ठीक हो जाता है। इस धाम की विशेषता यह भी है कि यहां पर संत चतुरदास महाराज बुटाटी धाम फेरी लगाने आने वाले या दर्शन करने आने सभी वर्गों के लोगों के लिए समान व्यवस्थाएं की गई हैं। अमीर-गरीब या वीआईपी लोगों के लिए अलग से किसी प्रकार की व्यवस्था न करके सभी एक लाइन में लगकर दर्शन करते हैं।

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My Kuldevi

श्रीबाण माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये परिवार

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श्री बाण माता का मुख्य मंदिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है। ब्राह्मणी माता, बायण माता और बाणेश्वरी माता जी के नाम से भी जानते है। राजपूत, माली, नाई समेत कई समाज में विभिन्न गोत्रों के लोग माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है।

जगदीश सैन

कुलदेवी श्री बाण माता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सोजत रोड़, पाली निवासी पीटीआई जगदीश सैन ने सैन इंडिया से शेयर की। उनके मुताबिक सैन समाज में कुछ परिवार ऐसे है जो बाण माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है।

बाण माता का मुख्य मंदिर चित्तौड़गढ़ में विजय स्तंभ से थोड़ी दूरी स्थित कालिका मंदिर के नजदीक है। बाण माता के इस मंदिर के पास अन्नपूर्णा माता का मंदिर भी है। श्री बाण माताजी के मंदिर राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल आदि में भी स्थित है।

बाणमाता मेवाड के सूर्यवंशी गहलोत सिसोदिया (राजपूत) राजवंश की कुलदेवी है। सैन समाज में गहलोत गौत्र के कई परिवार भी उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।

मान्यता के अनुसार, बाण माताजी का पुराना स्थान गुजरात में गिरनार में था। कालान्तर में वे चित्तौड़ पधारी थी। इसके पीछे एक कथा है। वर्षो पूर्व चित्तौड़ के महाराणा ने गुजरात पर आक्रमण कर गुजरात को जीत लिया। बाद में वहां राजा ने अपनी बेटी का विवाह महाराणा से कर दिया। राजकुमारी बाण माता की अनन्य भक्त थी। विवाह के बाद माँ बाण माता भी राजकुमारी के साथ चित्तौड़गढ़ पधार गयी। गिरनार में आज भी माता का प्राचीन मंदिर है।

” बाण तू ही ब्रह्माणी , बायण सु विख्यात ।

सुर संत सुमरे सदा , सिसोदिया कुल मात ।।”

बाण माता की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार हजारों साल पहले बाणासुर नाम का राक्षस था। बाणासुर भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के आशीर्वाद से उसे हजारों भुजाओं की शक्ति प्राप्त थी। शिवजी ने उससे और भी कुछ मांगने को कहा तो बाणासुर ने कहा की आप मेरे किले के पहरेदार बन जाओ।

यह सुन शिवजी को बडी ही ग्लानि और अपमान महसूस हुआ लेकिन, उन्होंने उसको वरदान दे दिया और उसके किले के रक्षक बन गए। बाणासुर परम बलशाली होकर सम्पूर्ण भारत और पृथ्वी पर राज करने लगा और उससे सभी राजा और कुछ देवता तक भयभीत रहने लगे। एक दिन बाणासुर को शिवजी से युद्ध करने की सनक चढ़ गई। शिवजी ने काफी समझाया लेकिन वह नहीं माना। उसने शिवजी से एक और वर प्राप्त था कि वे कृष्ण से युद्ध में उसका साथ देंगे और उसके प्राणों की रक्षा करेंगे।

समय बीतता गया और श्री कृष्ण ने द्वारिका बसा ली थी। उधर बाणासुर के एक पुत्री थी जिसका नाम उषा था। बाणासुर ने उषा का विवाह किसी तुच्छ राजकुमार से नहीं हो जाये, इसलिये किले में नजरबंद कर दिया। इधर, उषा को स्वप्न में दिखाई दिए एक युवक से प्रेम हो गया। उसने उसका चित्र सखी चित्रलेखा से बनवाया। चित्रलेखा ने बताया की यह राजकुमार तो श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का है।

उषा-अनिरुद्ध मंदिर

बाद में दोनों ने ओखिमठ नामक स्थान(केदारनाथ के पास) विवाह किया जहां उषा-अनिरुद्ध नाम से एक मंदिर आज भी है। क्रोधित बाणासुर से अनिरुद्ध और उषा को कैद कर लिया। जब श्रीकृष्ण और बलराम को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने बाणासुर पर हमला कर दिया। भयंकर युद्ध हुआ। बाणासुर हारने लगा तो उसने मदद के लिये शिव जी का आह्वान किया। वचनबद्ध शिवजी श्री कृष्ण और उनकी सेना से युद्ध करने लगे। इस भयानक युद्ध से ब्रह्माण्ड खतरे में पड़ गया। सभी देवता मां दुर्गा के पास पहुंचे। माता ने सभी को शांत किया। बाद में अनिरुद्ध और उषा का विवाह हो गया।

इधर, बाणासुर को एक बार फिर अहंकार आ गया। उसे लगा कि शिव के साथ अब कृष्ण यानि भगवान विष्णु भी उसके साथ है। राजाओं के परामर्श से ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किया। यज्ञ अग्नि से माँ पार्वती जी एक छोटी सी कुंवारी कन्या के रूप में प्रकट हुयीं और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं से वर मांगने को कहा। तब सभी राजाओं ने देवी माँ से बाणासुर से रक्षा की प्रार्थना की। माता जी ने सभी राजाओं-ऋषि मुनियों और देवताओं को बाणासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिलाया।

इसके बाद मां भारत के दक्षिणी छोर पर जा कर तपस्या में बैठ गयीं। दरअसल यह यह लीला बाणासुर को किले से दूर लाने की थी ताकि वह शिवजी से उसकी रक्षा नहीं कर सके। यहां वह बायण माता के नाम से जानी गई। आज भी उस जगह पर बायण माता को दक्षिण भारतीय लोगों द्वारा कुंवारी कन्या के नाम से पूजा जाता है और उस जगह का नाम भी कन्या कुमारी है।

जब पार्वती जी के अवतार देवी माँ बड़ी हुई तो उनकी सुन्दरता से मंत्रमुग्ध हो कर शिवजी उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह की तैयारियां होने लगी। तभी नारद मुनि ने सोचा यह विवाह अनुचित है। बायण माता तो पवित्र कुंवारी देवी हैं जो पार्वती जी का अवतार होने के बावजूद उनसे भिन्न हैं, यदि उन्होंने विवाह किया तो वे बाणासुर का वध नहीं कर पाएंगी। बाणासुर केवल परम सात्विकदेवी के हाथो ही मृत्यु को प्राप्त हो सकता था।

तब नारद जी ने एक चाल चली। विवाह का मुहुर्त सूर्योदय से पूर्व था। शिवजी रात को कैलाश से बारात लेकर निकले थे। रास्ते में नारद मुनि मुर्गे का रूप धरा और जोर जोर से बोलने लगे। शिवजी को लगा की सूर्योदय होने वाला है और अब विवाह की घडी निकल चुकी है। अतः शिवजी विवाह स्थल से 8-10 किलोमीटर दूर ही रुक गए। उधर, देवी मां दक्षिण में त्रिवेणी स्थान पर शिवजी का इंतज़ार करती रह गयी। जब शिवजी नहीं आये तो माताजी क्रोद्धित हो गयीं। उन्होंने जीवन पर्यन्त सात्विक रहने का प्रण ले लिया।

बाणासुर को माताजी की माया का पता चला तब वह खुद माताजी से विवाह करने को आया किन्तु देवी माँ ने माना कर दिया। जिस पर बाणासुर क्रोधित हो उठा। उसने युद्ध के बल पर देवी माँ से विवाह करने की ठानी। जिसमे देवी माँ ने प्रचंड रूप धारण कर उसकी पूरी दैत्य सेना का नाश कर दिया और अपने चक्र से बाणासुर का सर काट के उसका वध कर दिया।

भादरिया माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये

मृत्यु पूर्व बाणासुर ने परा-शक्ति के प्रारूप उस देवी से अपने जीवन भर के पापों के लिए क्षमा मांगी और मोक्ष की याचना करी जिस पर देवी माता ने उसकी आत्मा को मोक्ष प्रदान कर दिया। इस प्रकार देवी माँ को बाणासुर का वध करने की वजह से बायण माता, बाण माता या ब्रह्माणी माता के नाम से भी जाना जाता है।

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Haryana

समाज की ये बेटी सरकारी कर्मियों के लिये बनी मिसाल

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सैन समाज की यह एक बेटी उन तमाम सरकारी कर्मचारियों के लिये मिसाल है, जो नौकरी को केवल ड्यूटी मानते है। कोराना काल में इस बेटी ने एक साथ कई फर्ज निभाए। यह बेटी हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल है।

हरियाणा की सोनिया ओम डूलिया स्थानीय मीडिया की सुर्खियों में है। वह चंडीगढ़ निवासी है और हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल है। लोकडाउन के दौरान उनकी ड्यूटी मनमोहन नगर स्थित राधा स्वामी सत्संग भवन में बनाये गए आश्रय स्थल पर थी। 390 प्रवासी मजदूर यहां थे। इनमें कुछ मजदूरों के साथ बच्चे भी थें।

सोनिया ने एक दिन देखा कि ये बच्चे अपनी किताबों के पन्न फाड़कर उनके हवाई जहाज बनाकर खेल रहे थे। सोनिया ने बच्चों को किताबें फाड़ने से टोका तो वे बोले, ये अब काम की नहीं है। कोरोना के चलते उनकी पढ़ाई छूट गई है। बातचीत में पता चला कि ये बच्चे चौथी से छठीं क्लास में पढ़ते थें।

बच्चों का उत्तर सोनिया के लिये आश्चर्यजनक था। उसने तय किया कि बच्चे जब तक यहां है, वे उन्हें पढ़ाएगी। फिर क्या था, क्लास शुरू हुई। सोनिया के प्यार भरे व्यवहार ने बच्चों की सोच बदल दी। बच्चे पढ़ने लगे। पिछले दिनों ये बच्चे जब यहां से गए तो सोनिया भावुक हो उठी। बच्चे भी अपनी सोनिया दीदी को याद करते हुये यहां से गए। इन बच्चों की करीब महीने भर यहां पढ़ाई हुई। इस दौरान सोशल डिस्टेंसी का पूरा ध्यान रखा गया। यहां रहते हुई बच्चों की पढ़ाई उनके लिये काफी अहम रखेगी। दरअसल, सोनिया के प्रयास ने इन बच्चों के मन में पढ़ाई को लेकर आए नकारात्मक विचारों को बदला। उनमें पढ़ने की ललक फिर से पैदा की।

सोनिया की कर्तव्य परायणता दूसरे सरकाीर कर्मचारियों के लिये प्रेरणास्रोत है। सुरक्षा की नियमित ड्यूटी के साथ डूलिया ने एक शिक्षक और दीदी की भूमिका निभाई। सोनिया ने कंप्युटर साइंस में डिग्री ले रखी है। उनके पति ओम प्रकाश डूलिया का निजी व्यवसास है।

ना गांव में है इस गोत्र की कुलदेवी का प्राचीन मंदिर

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क्षौरकार संस्था ने किया कोरोना वॉरियर्स का सम्मान

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कोरोना योद्धाओं के काम को सलाम। संकट की इस घड़ी में ये योद्धा अपने काम से लोगों का दिल जीत रहे है। जोधपुर में सैन समाज क्षौरकार संस्था बासनी ने कोरोना वॉरियर्स का सम्मान किया।

जोधपुर। सैन समाज क्षौरकार संस्था बासनी द्वारा 80 कोरोना कर्मवीरों का सम्मान किया गया। तनावड़ा स्थित संस्था कार्यालय पर कोरोना महामारी के समय ड्यूटी कर रहे डॉक्टर, हॉस्पिटल कर्मचारी, पुलिसकर्मी, विद्युत कर्मी, पत्रकार इत्यादि कर्मवीरों का सम्मान किया गया। यह कार्यक्रम मंगलवार, 16 जून 2020 को संपन्न हुआ।

संस्था अध्यक्ष राम सा वीरा व उपाध्यक्ष रुपाराम ने बताया कि जगदीश भाटी, सुमेर खींची, मुन्ना लाल, पर्वत, देवीलाल, दाऊलाल, शिवलाल, अखिलेश पलाड़ा लैब टेक्नीशियन के मुख्य आतिथ्य में कार्यक्रम आयोजित हुआ। संस्थापक गणपत भाटी व मीडिया प्रभारी प्रवीण तनावड़ा ने बताया कि इस अवसर पर क्षौरकार संस्था जोधपुर द्वारा क्षौरकार भाइयों को पीपीई किट वितरित किए गए।

कोषाध्यक्ष कंवरलाल परिहार ने बताया कि जोधपुर के मथुरा दास माथुर हॉस्पिटल, उमेद हॉस्पिटल, एम्स हॉस्पिटल, मेडी प्लस हॉस्पिटल मे कोरोना महामारी के चलते ड्यूटी कर रहे हैं 50 कर्म वीरों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर स्वरूप, बांकाराम, मनोहर, मनोज, दिनेश, सुरेश, रमेश, गोविन्द, प्रदीप ,सुनील, निम्बेश, टीकम सैन, जितेंद्र, बाबुलाल, पप्पाराम, अशोक वीरा इत्यादि संस्था पदाधिकारी मौजूद रहे।

गलाना गांव में है इस गोत्र की कुलदेवी का प्राचीन मंदिर

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कुलदेवी

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