Connect with us

Feature

45 से अधिक नामों से है नाई समाज की पहचान

Published

on

sain samaj, sen community, nai community india, savita, napit,

देश में समाज बंधुओं को भौगोलिक आधार पर अलग-अलग नाम से पहचान मिली हुई है। सर्वाधिक प्रचलित सैन या सेन है।

नाई जाति का इतिहास समृद्ध है। नाई या सैन समाज को और भी कई नामों से पहचाना जाता है। भारत में हमारे समाज की पहचान 45  से ज्यादा नामों होती है। इनमें नाई, सैन, सेन, क्षौरकार प्रमुख है। अंग्रेजी में Sain, Sen, Nai प्रचलित है।

इंटरनेट एवं अन्य स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर नाई समाज के इन नामों की सूची तैयार करने का प्रयास सैन इंडिया ने किया है। इस सूची में यदि कोई नाम रह गया है अथवा किसी नाम को लेकर कोई आपत्ति या सुझाव हो तो आवश्य बतायें। आपके सुझाव के आधार पर साइट को अपडेट करने में मदद मिलेगी। आप अपने महत्वपूर्ण सुझाव Email या  WhatsApp से भेज सकते है। अधिक जानकारी आप हमारे Contact us पर क्लिक करें। सहयोग के लिये सैन इंडिया आपका आभारी रहेगा।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में सैन समाज के प्रचलित नाम

दिल्ली

नायी, नायी ब्राह्मण, सविता, सैन, बारबर

उत्तरप्रदेश

नायी, नायी पांडे, पांडे ब्राह्मण, नायी ब्राह्मण

पंजाब

नायी ब्राह्मण,राजा, महता, ठाकुर

गुरुदासपुर

यजक, याज्ञिक, मोरासु उप्पिना, मारुनायी, कैकुलम और शीलवंत

राजस्थान

पडिहार, पंवार, देवडा, राठौर, वैधनाई, सैन, सेन नाई

अजमेर मेवाड़

नायी, नायी ब्राह्मण, सैन, बारबर

मारवाड

नेविनि,डोगरा

बिहार

 ठाकुर, हज्जाम, नायी, नापित, नायी ब्राह्मण, नायी सैन।

मध्यप्रदेश

म्हाली, नायी ब्राह्मण

ग्वालियर

नायी,नायी पांडे, नायी ब्राह्मण

ओड़िशा

भद्री, बारिक, भंडारी।

पश्चिम बंगाल

नापित, हज्जाम, नाऊ, नायी, सवितृ ब्राह्मण

गुजरात

वाणन्द, वालन्द।

महाराष्ट्र

कैलासी, नायडॆ, खवास, महाल, मंगला, नायिन्दा

मुंबई, वडौदरा

बालन्द, नादिग, केलसी, नायी ब्राह्मण

आन्ध्र प्रदेश

चित्तूर,कडाया, गुंटूर कृष्णा, नैलोर

हैदराबाद

न्हावी,मंगल, कैलासी, नायी हज्जाम

कर्नाटक

नायिन्द

चेन्नई

मरुथवर,कसूवन, भण्डारी,कबूठीयन, बारबर, नायी ब्राह्मण,मंगल, अम्बटन ।

कोच्चि

अम्ब्टन, मारायन, नायर, बेल किहल ।

आसाम

नायी, चन्द्रवैध ।

कश्मीर

हज्जाम, नापित, भन्डारी, नायी ब्राह्मण।

सैन (नाई) समाज के ताजा सामाचार प्राप्त करने के लिये फेसबुक पर लाइक करें और ट्विटर पर फॉलो करें। सैन समाज से जुड़ी जानकारी एवं समाचार आप हमारे माध्यम से पूरे समाज के साथ शेयर करें। यदि आपके पास कोई जानकारी या सूचना है तो हमें आवश्य भेजे। अधिक जानकारी के लिये Contact Us पर क्लिक करें।

Spread the love
Advertisement
3 Comments

3 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Feature

जमवाय माता को सैन समाज के कई परिवार मानते है कुलदेवी

Published

on

जमवाय माता भगवान राम के पुत्र कुश के वंश कछवाहा की कुलदेवी है। सैन समाज में कुछ परिवार ऐसे हैं जो जमवाय माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है।

अयोध्या के राम जन्म भूमि प्रकरण में श्रीराम के वंशज का मामला देशभर में चर्चित है। जयपुर के पूर्व राजघराने की ओर से श्रीराम का वंशज होने का दावा गया गया है। एमपी और पूर्व राजपरिवार की सदस्य दीया कुमारी ने पोथीखाना में उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह दावा किया है। उन्होंने कहा कि जयपुर राजपरिवार की गद्दी भगवान राम के पुत्र कुश के वंशजों की है। भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज होने से ढूंढाड़ के राजा कछवाहा कहलाने के साथ राम की 309वीं पीढ़ी में मानते हैं।

यह जानकारी का उल्लेख इसलिये किया गया है कि जमवाय माता मुख्यत: कछवाहा वंश की कुलदेवी है। आज भी राजपरिवार के सदस्य यहां ढोंक लगाने जाते है। ऐसा नहीं है कि जमवाय माता केवल कछवाहा वंश की कुलदेवी है। दूसरी जातियों में कई परिवार ऐसे हैं जो माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है। सैन समाज में भी कई परिवार ऐसे हैं जो जमवाय माता को कुलदेवी मानते है। खासकर जयपुर, दौसा, अलवर में रहने वाले सैन समाज के कई परिवारों कुलदेवी जमवा माता या जमवाय  माता है। जयपुर निवासी महेश कुमार सैन ने बताया कि उनका गोत्र आमेरिया अजमेरिया है। उनके परिवार में  माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है।

जमवाय माता का मंदिर कहां है

जमवाय माता का मंदिर जयपुर शहर से करीब 55 किमी दूर है। मंदिर जयपुर कई साल तक प्यास बुझाने वाले जमवा रामगढ़ बांध से मात्र एक​ किलोमीटर दूर है। आसपास पहाड़ियां है और यह जमवा रामगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में आता है। बारिश के दिनों में यहां आसपास झरने बहते है। इन दिनों यहां गोठ और पिकनिक के आयोजन होते है। यहां तक पहुंचने के जयपुर से प्राइवेट और सरकारी बसें उपलब्ध है। जयपुर से नारायणी धाम, अलवर का एक रास्ता भी जमवा माता मंदिर होकर जाता है। नारायणी धाम के लिये जयपुर से पैदल परिक्रमा का पड़ाव भी यहां होता है। नवरात्रों में यहां दर्शनार्थियों की संख्या ज्यादा रहती है।

जमवाय माता की कथा

जयपुर के नजदीक यह इलाका पहले मांच के नाम से जाना जाता था। एक बार राजा दूल्हाराय ने मांच पर हमला कर मीणों से युद्ध किया। इस युद्ध में वे हार गये और रणभूमि में मूर्छित हो कर गिर पड़े। रात में बुढवाय देवी रणभूमि में आई और दूल्हाराय के सिर पर हाथ फेरा। उनकी मूर्छा टूटी तो माता ने खुद को जमवाय नाम से पूजने और मन्दिर बनवाने का वचन मांगा। दूल्हाराय ने मां को वचन पूरा करने का भरोसा दिलाया। उनकी सेना ​जीवित हो गई और फिर उन्होंने मांच पर हमला बोला। इसमें उनकी जीत हुई। इसके बाद ये मंदिर बनवाया।

यहां के बारे में एक और घटना का भी जिक्र मिलता है। राजा कांकील भी मीणों के साथ युद्ध करते हुए सेना के साथ मूर्छित होकर रणक्षेत्र में गिर पड़े। तब भी जमुवाय माता सफेद धेनु (गाय) के रूप में प्रकट हुई। उन्होंने दूध की वर्षा कर पूरी सेना को जीवित कर दिया। माता ने शत्रु पर विजय प्राप्त कर आमेर बसाने की आदेश दिया।

माता के मन्दिर के गर्भगृह में माता की प्रतिमा के दाहिनी तरफ धेनु एवं बछड़े व बायीं ओर बुढ़वाय माता की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में शिवालय एवं भैंरव का स्थान भी है। राजा ने अपने आराध्य देव रामचंद्र एवं कुलदेवी जमुवाय के नाम पर मांच का नाम जमुवाय रामगढ़ रखा गया। जो बाद मे जमुवा रामगढ़ के रूप में जाना जाने लगा।

Spread the love
Continue Reading

Feature

सैन समाज के कई परिवारों की कुलदेवी है जीण माता

Published

on

जीण माता कई परिवार एवं गोत्रों की कुलदेवी है। सैन समाज में भी कई गोत्र ऐसे हैं जो जीण भवानी को कुलदेवी मानते है। जीण माता मां दुर्गा का रूप है।

जीण माता के दरबार में गोपाल मारवाड़ी और उनकी पत्नी

महाराष्ट्र से सैन समाज के गोपाल मारवाड़ी ने जानकारी दी है कि उनका गोत्र जलवानी है। जलवानी गोत्र के कई परिवार कुलदेवी के रूप में जीण माता को पूजते है। रवि चांगिल के अनुसार, उनके भी परिवार में कुलदेवी के रूप में जीण माता को पूजा जाता है। जीण माता के यूं तो देशभर में कई मंदिर है। प्राचीन और असली मंदिर राजस्थान में है। सीकर में गोरिया से कुछ किमी दूर यह भव्य एवं प्राचीन मंदिर स्थित है।

जयपुर से जीण माता की दूरी तकरीबन 115 किमी है। जबकि प्रसिद्ध खाटू धाम से माता का मंदिर 27 किमी. है। जीण माता से सालासर धाम की दूरी करीब 75​ किमी. है। खाटू श्याम जी, जीण माता और सालासर बालाजी के प्रति गहरी धार्मिक आस्था है। इसी वजह से यहां हर दिन भक्त पहुंचते है। मेेले के मौके पर यहां लाखों भक्त पहुंचते है। जीण माता के मंदिर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि यह मंदिर पांडवों ने बनाया था। अज्ञातवास का कुछ समय पांडवों ने यहां बिताया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह मंदिर करीब 1000 साल पुराना है।

माता के चमत्कार की कई कहानियां है। मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया। उसने अपनी सेना यहां भेज दी।  तभी मधुमक्खियों के झुंड ने मुगल सेना पर हमला बोल दिया। सेना को पीछे हटना पड़ा। इतना ही नहीं औरंगजेब भी बीमार पड़ गया। बाद में उसने माता के दरबार में अखंड जोत जलवाने की व्यवस्था का भरोसा दिलवाया, तब वह ठीक हुआ। उसके समय इस परम्परा का निर्वाह हुआ।

जीण माता की कहानी

जीण माता का असली नाम जयंतीमाला था। जीण अपने भाई हर्ष से बेहद प्रेम करती थी। एक बार जीण और उसकी भाभी के बीच बहस छिड़ गई कि हर्ष उनमें से किसको ज्यादा चाहते है। इसकी परीक्षा के लिये उन्होंने तय किया पानी लाते समय हर्ष सबसे पहले जिसके सिर से घड़ा उतारेंगे, उससे ज्यादा प्रेम करते है। दोनों पानी से भरा घड़ा लेकर घर पहुंचती है। दोनों के बीच विवाद से अनजान हर्ष सबसे पहले अपनी पत्नी के सिर से घड़ा उतारते है। यह देखकर जीण को गुस्सा आ जाता है और सब कुछ छोड़कर काजल पर्वत पहुंच जाती है और वहां देवी तपस्या करने लगती है। हर्ष को जब पूरी बात पता चलती है तो दुख होता है। वह जीण को मनाने जाते है लेकिन, जीण अपनी तपस्या तोड़ने को राजी नहीं होती। ऐसे में हर्ष भी पर्वत पर जाकर भैंरों की तपस्या करने लगते है। जीण माता को देवी रूप और हर्ष को भैंरों पद प्राप्त होता है।

सम्मान पा कर अभिभूत हुये बुजुर्ग और प्रतिभाएं

जीण माता के भक्त

जीण माता के प्रति भक्तों में अगाध श्रद्धा है। माता के भक्त पूरे राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात समेत देश के अधिकांश राज्यों में है। विदेशों में भी माता के भक्त हैं। राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य, नाई (सैन) आदि समाजों में कई गोत्र ऐसे हैं जो माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है। जात जड़ूले माता के दरबार में करते है। चैत्र और ​अश्विनी मास के नवरात्रों में यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है। जीण माता के भजन, जीण माता की आरती, जीण माता चालीसा से भक्त माता को रिझाते है।

सैन (नाई) समाज के ताजा सामाचार प्राप्त करने के लिये फेसबुक पर लाइक करें और ट्विटर पर फॉलो करें। सैन समाज से जुड़ी जानकारी एवं समाचार आप हमारे माध्यम से पूरे समाज के साथ शेयर करें। यदि आपके पास कोई जानकारी या सूचना है तो हमें आवश्य भेजे। WHATSAPP NO. 8003060800.

Poll: नाई जाति को क्या SC में शामिल किया जाना चाहिये, राये दें

 

Spread the love
Continue Reading

Feature

गलाना गांव में है इस गोत्र की कुलदेवी का प्राचीन मंदिर

Published

on

गलाना गांव में  प्राचीन मंदिर आस्था का केंद्र है। यह गांव कोटा में जिला मुख्यालय से करीब 18 किमी दूर स्थित है।

कुलदेवी बांगड़दिया

गलाना गांव लाड़पुरा तहसील में आता है। सांगोद रोड़ पर स्थित इस गांव में बांगड़दिया सती माता का प्राचीन मंदिर है। सैन समाज में बांगडदिया परिवार इस माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है। महावीर सैन बांगड़दिया ने इस बारे में जानकारी दी। कुलदेवी बांगड़दिया सेन विकास समिति के प्रधान महासचिव जगदीश प्रसाद सैन ने बताया कि यह मंदिर सैकड़ों साल प्राचीन है। इसका प्रमाण यहां उपलब्ध शिलालेख है। हालांकि इस शिलालेख पर क्या अंकित है, इसको जानने का प्रयास किया जा रहा है।

जानकारी के अभाव में पहले यहां बहुत कम लोग जा पाते थे। अब इसका प्रचार प्रसार किया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी को इस मंदिर के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके। यहां कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते है। सैन समाज के गोत्र बांगड़दिया के अधिकांश परिवार राजस्थान के हाडौती अंचल में है। कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां जिले हाड़ौती में आते है।

सैन (नाई) समाज के ताजा सामाचार प्राप्त करने के लिये फेसबुक पर लाइक करें और ट्विटर पर फॉलो करें। सैन समाज से जुड़ी जानकारी एवं समाचार आप हमारे माध्यम से पूरे समाज के साथ शेयर करें। यदि आपके पास कोई जानकारी या सूचना है तो हमें आवश्य भेजे। WHATSAPP NO. 8003060800.

भादरिया माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये

अचलानंद महाराज से मिला पुणे सैन समाज का प्रतिनिधिमंडल

Spread the love
Continue Reading
Advertisement

Facebook

कुलदेवी

My Kuldevi2 months ago

श्रीबाण माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये परिवार

श्री बाण माता का मुख्य मंदिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है। ब्राह्मणी माता, बायण माता और बाणेश्वरी माता जी...

Feature1 year ago

जमवाय माता को सैन समाज के कई परिवार मानते है कुलदेवी

जमवाय माता भगवान राम के पुत्र कुश के वंश कछवाहा की कुलदेवी है। सैन समाज में कुछ परिवार ऐसे हैं...

Feature1 year ago

सैन समाज के कई परिवारों की कुलदेवी है जीण माता

जीण माता कई परिवार एवं गोत्रों की कुलदेवी है। सैन समाज में भी कई गोत्र ऐसे हैं जो जीण भवानी...

Feature1 year ago

गलाना गांव में है इस गोत्र की कुलदेवी का प्राचीन मंदिर

गलाना गांव में  प्राचीन मंदिर आस्था का केंद्र है। यह गांव कोटा में जिला मुख्यालय से करीब 18 किमी दूर...

Feature1 year ago

भादरिया माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये

श्री भादरिया माता का मंदिर जन-जन की आस्था का केंद्र है। विभिन्न समाजों में कई परिवारों में माता को कुलदेवी...

Feature1 year ago

कुलदेवी के रूप में होती है ‘मां नागणेची’ की पूजा

कई परिवारों में कुलदेवी के रूप में मां नागणेची की पूजा की जाती है। मां नागणेची को नागणेच्या, चक्रेश्वरी, राठेश्वरी...

Feature1 year ago

इन गोत्रों में कुलदेवी की रूप में पूजी जाती सच्चियाय माता

सैन समाज के विभिन्न गोत्रों की कुलदेवी परिचय की श्रंखला में प्रस्तुत हैं सच्चियाय माता की जानकारी। सच्चियाय माता का...

Feature1 year ago

सैन समाज के इन गोत्रों के लिये खास है हजारों साल पुराना देवी का यह मंदिर

अर्बुदा देवी मंदिर को अधर देवी के नाम से भी जाना जाता है। मां अर्बुदा, मां कात्यायनी का ही रुप...

Feature1 year ago

नारायणी धाम: पानी कितने साल से आ रहा हैं, जानकार रह जायेंगे हैरान

नारायणी धाम पर कुंड से अटूट जलधारा का रहस्य आज भी कोई नहीं जान सका है। पानी की धार लगातार...

Feature1 year ago

कर्मावती कौन थीं और कैसे बन गई नारायणी, जानिये

विजयराय और रामहेती के घर एक बालिका जन्मी। नाम रखा गया कर्मावती। सयानी होने पर उनका विवाह करणेश जी के...

Trending

Don`t copy text!