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चिंतन : यूं नहीं मिलेंगे अधिकार, सैन समाज को करना होगा संघर्ष

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सैन समाज को अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करना होगा। इसके लिये सभी को समाज के एक निशान, विधान और संबिधान के अंगर्तत लाना होगा।

यूपी के ललितपुर जिले के महरौनी में सैन समाज का राष्ट्रीय चिंतन शिविर मंगलवार को संपन्न हुआ। “भारत को सोने की चिड़िया कहे जाने वाले गौरवशाली इतिहास के पुनर्स्थापन में नन्द सैन समाज की दशा व दिशा” विषय पर आयोजित इस राष्ट्रीय चिंतन शिविर में समाज की एकता और अधिकारों के संरक्षण पर मंथन हुआ। इस चिंतन शिविर में देशभर से आये वक्ताओं ने अपने—अपने विचार व्यक्त किये। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में सामाजिक एकता और राजनीति में सैन समाज की भागीदारी को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि इसके लिये युवाओं को आगे आना होगा। और समाज को एक संघ के रूप में स्थापित करना होगा। जरूरी है कि इसके लिये सैन समाज का एक निशान, विधान और संविधान हो।

इस शिविर का आयोजन पूर्व एमएलसी,पूर्व पीसीएफ चेयरमैन रामचन्द्र प्रधान के मुख्य आतिथ्य व मुन्नालाल सेन ठेकेदार की अध्यक्षता में किया गया। रामचन्द्र प्रधान ने कहा कि सैन समाज को राजनैतिक हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करना होगा। इसके लिये युवाओं को शिक्षित, संगठित और संकल्पित होना होगा। इस अवसर पर राष्ट्रीय चितंक विचारक भानुप्रताप सिंह ने कहा कि सैन समाज को सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक उन्नति करना हैं तो संघ बनाना होगा। समाज के लोग सत्ता में काबिज होकर मालिक बन सकते है। आजाद पार्टी अपनी जिंदगी अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सर्वजीत सिंह खण्डसाल सैन समाज के लोगों पर रहे अत्याचारों पर अफसोस जताया। उन्होंने कहा कि ये चिंता का विषय है। इन अत्याचारों का विरोध होना चाहिये।

गौरव ने बुलंद हौंसलों से कर दिया समाज को गौरवान्वित

पूर्व सैनिक रणवीर सिंह बागपत ने कहा कि सेन समाज के उत्थान के लिए सुशिक्षा की महती आवश्यकता हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए मुन्ना लाल सेन ठेकेदार ने कहा कि राष्ट्रीय चिंतन शिविर सेन समाज की उन्नति में प्रासंगिक हैं। जननायक कर्पूरी ठाकुर समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि समाज की एकता व अखण्डता के लिए पद का त्याग करने के लिए तत्पर हूँ। डॉ. यतेंद्र कुमार सैन, प्रदेश अध्यक्ष सैन समाज बुलन्दशहर ने कहा कि युवा ही सैन समाज की दशा व दिशा बदल सकता है।

एक झंडा, एक निशान, एक विधान, एक संबिधान

कार्यक्रम को डॉ अरुण कुमार सविता, प्रदेश अध्यक्ष सविता समाज कानपुर, भारतीय सैन समाज के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र सैन टीटीआई, डॉ विनोद शर्मा जौनपुर, शिवभजन सविता रिटायर्ड दरोगा कानपुर, सुंदर कुमार आर्य हापुड़, सत्यम सैन हाथरस, पत्रकार राधेश्याम सविता कानपुर, जेपी आर्य उन्नाव, बीड़ी बंसल महोबा, नारायण श्रीवास सम्पादक जबलपुर, रामजी रामायणी, हरिशंकर नापित शिक्षक टीकमगढ, देवेंद्र नापित टीकमगढ, केएल नापित शिक्षक छतरपुर, विनोद सैन जिलाध्यक्ष ग्वालियर, जयकरन सैन लवकुश नगर, डॉ विवेक शर्मा जौनपुर, संजय सविता कालपी, किरण सैन जिलाध्यक्ष ललितपुर, समाजसेविका उषा सैन झाँसी आदि ने वक्ताओं ने समाज की मजबूती के लिये समाज का एक झंडा, एक निशान, एक विधान, एक संबिधान होने की बात कही। संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य ने कहा कि सैन समाज आज भी मानसिक गुलामी का शिकार बना हुआ है। इसके मूल में अशिक्षा,रुढ़िवादी प्रथाएं, अंधविश्वास और पाखंड का भ्रमजाल है। इस कारण ही सैन समाज की सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्थिति दयनीय हैं।

सैन समाज का यह सम्मेलन राजनीतिक दलों के लिये जानिये क्यों है महत्वपूर्ण

चिंतन शिविर में ये भी मौजूद थें

संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य  के अनुसार, चिंतन शिविर में कार्यक्रम में नारायण श्रीवास जबलपुर सम्पादक सन्त सैन वाणी जबलपुर,सत्यम सैन हाथरस,जेपी आर्य उन्नाव, राम बाबू श्रीवास प्रदेशाध्यक्ष श्रीवास सैन महासभा ग्वालियर,डॉ विनोद शर्मा जौनपुर,अनिल शर्मा उन्नाव,आशीष शर्मा लखनऊ,चौधरी पवन श्रीवास नेतीजी प्रदेश अध्यक्ष भिंड,के एल नापित शिक्षक छतरपुर,डॉ राकेश सैन नौगांव,रघुवीर शरण यागिक जिलाध्यक्ष श्रीवास सैन महासभा भिंड, विश्राम श्रीवास जिला उपाध्यक्ष भिंड,रामस्वरूप मास्टर नारायणी ट्रस्ट गोहद भिंड,हरिसिंह श्रीवास ग्वालियर,जयकरन सैन प्रदेश संघठन मंत्री लवकुशनगर,विनोद सेन जिलाध्यक्ष ग्वालियर,श्या म लाल सेन लवकुशनगर,,राजेन्द्र सेन छबीला सेन समाज अध्यक्ष शाहगढ़,चिरंजी लाल झांसी,डॉ विवेक शर्मा वाराणसी,संजय कुमार सविता कालपी,राकेश शर्मा जौनपुर,दिलीप सविता उन्नाव,अमृत लाल सैन ईओ बड़ागांव,ओमनाथ यागिक उरई, पुत्तन यागिक उरई, जमुना दास पचौखरा,राजकिशोर सैन स्वास्थ्य विभाग झाँसी, भारती सविता झाँसी, गीता सेन झाँसी,नरेश यागिक कौंच, आनंद यागिक कौंच,द्वारिका प्रसाद सविता कानपुर,बैनी प्रसाद सेन बीना, सुखलाल सैन बीना, काशीराम सैन बीना, अमित सैन एड.बीना, प्रकाश सैन बीना,पीएल सैन शिक्षक बीना,शम्भू दयाल श्रीवास भिंड,रामलखन श्रीवास भिंड,धर्मेंद्र यज्ञीक,अनिल सविता कानपुर,राकेश सैन टीकमगढ़,कृपाल श्रीवास्तव जिलाध्यक्ष कासगंज, भरत सविता कासगंज,नरेंद्र सेन ग्वालियर,भरत सैन पार्षद झाँसी,अंशुल सैन पार्षद टीकमगढ़, मुकेश सैन क्षेत्र पंचायत सदस्य सौजना, संजय सेन झाँसी,घनश्याम सैन पत्रकार,अशोक सैन पत्रकार,धनीराम सैन अध्यक्ष ललितपुर,कैलाश सैन जमुनिया,अज्जुद्दी सेन जिलाध्यक्ष ललितपुर,सोहन लाल सैन ललितपुर,कीरत सेन सिमिरिया,सीताराम सेन जिलाध्यक्ष नवोदित सेन समाज टीकमगढ़,हरीशंकर नापित शिक्षक सचिव नवोदित सैन समाज टीकमगढ़, देवेंद्र नापित प्रवक्ता जिला कांग्रेस टीकमगढ़, धर्मदास नापित शिक्षक,हीरालाल सैन, सुखचैन सैन , राकेश सैन टीकमगढ़,रमेश सैन नापित टीकमगढ,संतोष सैन शिक्षक जौरा,शिवकुमार नापित शिक्षक कुंडेश्वर,ओमप्रकाश सैन शिक्षक मड़ावरा, शिशुपाल सैन शिक्षक ललितपुर,आदि उपस्थित रहें। संचालन संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य व आभार मंडी सहायक कृष्णानंद यागिक व नीरज सेन टीए कृषि विभाग ने जताया।

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8 मई को मनेगी सैन जयंती, सरकारी गाइडलाइन के अनुसार होंगे आयोजन

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सैन जयंती 8 मई को है। सैन जयंती आयोजन की रुपरेखा विभिन्न संगठन बना रहे है। हालांकि कोरोना महामारी के चलते आयोजन सरकारी गाइडलाइन के अनुसार ही होंगे।

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सैन जी महाराज

सैन समाज के आराध्य श्री सैन जी महाराज की जयंती 8 मई 2021 को है। पिछले साल की तरह इस बार भी कोरोना महामारी का असर सैन जयंती कार्यक्रमों पर पड़ने की आशंका बनी है। पिछले साल सैन जयंती 19 अप्रैल को थी और उस समय देशभर में लॉकडाउन और कई जगह कर्फ्यू था। इस वजह से कहीं भी सामूहिक आयोजन नहीं हो पाये थे। सैन परिवारों ने घरों में दीपक जलाकर आराध्य श्री सैन जी महाराज की पूजा अर्चन की थी।

इस साल सैन जयंती पर कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते आयोजन समितियां सरकारी गाइडलाइन का इंतजार कर रही है। इन समितियों के पदाधिकारियों के अनुसार, राज्य सरकारें एवं स्थानीय प्रशासन की मंजूरी मिलने के बाद ही शोभायात्राएं एवं कलशयात्रा या फिर सामूहिक कार्यक्रम आयोजित हो पाएंगे।

सैन जी महाराज: परिचय

भक्तमाल के सुप्रसिद्ध टीकाकार प्रियदास के अनुसार संत शिरोमणि सैन जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1557 में वैशाख कृष्ण-12 (द्वादशी), दिन रविवार को चन्दन्यायी के घर में हुआ था। बचपन में इनका नाम नंदा रखा गया।

वह क्षेत्र जहां सैन महाराज रहते थे सेनपुरा के नाम से जाना जाता है। यह स्थान बघेलखण्‍ड के बांधवगढ़ के अंतर्गत आता है। बिलासपुर-कटनी रेल लाइन पर जिला उमरिया से 32 किलोमीटर की दूरी पर बांधवगढ़ स्थित है।

संत सैन महाराज बचपन से ही विनम्र, दयालु और ईश्वर में दृढ़ विश्वास रखते थे। सेन महाराज ने गृहस्थ जीवन के साथ-साथ भक्ति के मार्ग पर चलकर भारतीय संस्कृति के अनुरूप जनमानस को शिक्षा और उपदेश के माध्यम से एकरूपता में पिरोया।

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My Kuldevi

श्रीबाण माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये परिवार

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श्री बाण माता का मुख्य मंदिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है। ब्राह्मणी माता, बायण माता और बाणेश्वरी माता जी के नाम से भी जानते है। राजपूत, माली, नाई समेत कई समाज में विभिन्न गोत्रों के लोग माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है।

जगदीश सैन

कुलदेवी श्री बाण माता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सोजत रोड़, पाली निवासी पीटीआई जगदीश सैन ने सैन इंडिया से शेयर की। उनके मुताबिक सैन समाज में कुछ परिवार ऐसे है जो बाण माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते है।

बाण माता का मुख्य मंदिर चित्तौड़गढ़ में विजय स्तंभ से थोड़ी दूरी स्थित कालिका मंदिर के नजदीक है। बाण माता के इस मंदिर के पास अन्नपूर्णा माता का मंदिर भी है। श्री बाण माताजी के मंदिर राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल आदि में भी स्थित है।

बाणमाता मेवाड के सूर्यवंशी गहलोत सिसोदिया (राजपूत) राजवंश की कुलदेवी है। सैन समाज में गहलोत गौत्र के कई परिवार भी उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।

मान्यता के अनुसार, बाण माताजी का पुराना स्थान गुजरात में गिरनार में था। कालान्तर में वे चित्तौड़ पधारी थी। इसके पीछे एक कथा है। वर्षो पूर्व चित्तौड़ के महाराणा ने गुजरात पर आक्रमण कर गुजरात को जीत लिया। बाद में वहां राजा ने अपनी बेटी का विवाह महाराणा से कर दिया। राजकुमारी बाण माता की अनन्य भक्त थी। विवाह के बाद माँ बाण माता भी राजकुमारी के साथ चित्तौड़गढ़ पधार गयी। गिरनार में आज भी माता का प्राचीन मंदिर है।

” बाण तू ही ब्रह्माणी , बायण सु विख्यात ।

सुर संत सुमरे सदा , सिसोदिया कुल मात ।।”

बाण माता की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार हजारों साल पहले बाणासुर नाम का राक्षस था। बाणासुर भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के आशीर्वाद से उसे हजारों भुजाओं की शक्ति प्राप्त थी। शिवजी ने उससे और भी कुछ मांगने को कहा तो बाणासुर ने कहा की आप मेरे किले के पहरेदार बन जाओ।

यह सुन शिवजी को बडी ही ग्लानि और अपमान महसूस हुआ लेकिन, उन्होंने उसको वरदान दे दिया और उसके किले के रक्षक बन गए। बाणासुर परम बलशाली होकर सम्पूर्ण भारत और पृथ्वी पर राज करने लगा और उससे सभी राजा और कुछ देवता तक भयभीत रहने लगे। एक दिन बाणासुर को शिवजी से युद्ध करने की सनक चढ़ गई। शिवजी ने काफी समझाया लेकिन वह नहीं माना। उसने शिवजी से एक और वर प्राप्त था कि वे कृष्ण से युद्ध में उसका साथ देंगे और उसके प्राणों की रक्षा करेंगे।

समय बीतता गया और श्री कृष्ण ने द्वारिका बसा ली थी। उधर बाणासुर के एक पुत्री थी जिसका नाम उषा था। बाणासुर ने उषा का विवाह किसी तुच्छ राजकुमार से नहीं हो जाये, इसलिये किले में नजरबंद कर दिया। इधर, उषा को स्वप्न में दिखाई दिए एक युवक से प्रेम हो गया। उसने उसका चित्र सखी चित्रलेखा से बनवाया। चित्रलेखा ने बताया की यह राजकुमार तो श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का है।

उषा-अनिरुद्ध मंदिर

बाद में दोनों ने ओखिमठ नामक स्थान(केदारनाथ के पास) विवाह किया जहां उषा-अनिरुद्ध नाम से एक मंदिर आज भी है। क्रोधित बाणासुर से अनिरुद्ध और उषा को कैद कर लिया। जब श्रीकृष्ण और बलराम को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने बाणासुर पर हमला कर दिया। भयंकर युद्ध हुआ। बाणासुर हारने लगा तो उसने मदद के लिये शिव जी का आह्वान किया। वचनबद्ध शिवजी श्री कृष्ण और उनकी सेना से युद्ध करने लगे। इस भयानक युद्ध से ब्रह्माण्ड खतरे में पड़ गया। सभी देवता मां दुर्गा के पास पहुंचे। माता ने सभी को शांत किया। बाद में अनिरुद्ध और उषा का विवाह हो गया।

इधर, बाणासुर को एक बार फिर अहंकार आ गया। उसे लगा कि शिव के साथ अब कृष्ण यानि भगवान विष्णु भी उसके साथ है। राजाओं के परामर्श से ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किया। यज्ञ अग्नि से माँ पार्वती जी एक छोटी सी कुंवारी कन्या के रूप में प्रकट हुयीं और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं से वर मांगने को कहा। तब सभी राजाओं ने देवी माँ से बाणासुर से रक्षा की प्रार्थना की। माता जी ने सभी राजाओं-ऋषि मुनियों और देवताओं को बाणासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिलाया।

इसके बाद मां भारत के दक्षिणी छोर पर जा कर तपस्या में बैठ गयीं। दरअसल यह यह लीला बाणासुर को किले से दूर लाने की थी ताकि वह शिवजी से उसकी रक्षा नहीं कर सके। यहां वह बायण माता के नाम से जानी गई। आज भी उस जगह पर बायण माता को दक्षिण भारतीय लोगों द्वारा कुंवारी कन्या के नाम से पूजा जाता है और उस जगह का नाम भी कन्या कुमारी है।

जब पार्वती जी के अवतार देवी माँ बड़ी हुई तो उनकी सुन्दरता से मंत्रमुग्ध हो कर शिवजी उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह की तैयारियां होने लगी। तभी नारद मुनि ने सोचा यह विवाह अनुचित है। बायण माता तो पवित्र कुंवारी देवी हैं जो पार्वती जी का अवतार होने के बावजूद उनसे भिन्न हैं, यदि उन्होंने विवाह किया तो वे बाणासुर का वध नहीं कर पाएंगी। बाणासुर केवल परम सात्विकदेवी के हाथो ही मृत्यु को प्राप्त हो सकता था।

तब नारद जी ने एक चाल चली। विवाह का मुहुर्त सूर्योदय से पूर्व था। शिवजी रात को कैलाश से बारात लेकर निकले थे। रास्ते में नारद मुनि मुर्गे का रूप धरा और जोर जोर से बोलने लगे। शिवजी को लगा की सूर्योदय होने वाला है और अब विवाह की घडी निकल चुकी है। अतः शिवजी विवाह स्थल से 8-10 किलोमीटर दूर ही रुक गए। उधर, देवी मां दक्षिण में त्रिवेणी स्थान पर शिवजी का इंतज़ार करती रह गयी। जब शिवजी नहीं आये तो माताजी क्रोद्धित हो गयीं। उन्होंने जीवन पर्यन्त सात्विक रहने का प्रण ले लिया।

बाणासुर को माताजी की माया का पता चला तब वह खुद माताजी से विवाह करने को आया किन्तु देवी माँ ने माना कर दिया। जिस पर बाणासुर क्रोधित हो उठा। उसने युद्ध के बल पर देवी माँ से विवाह करने की ठानी। जिसमे देवी माँ ने प्रचंड रूप धारण कर उसकी पूरी दैत्य सेना का नाश कर दिया और अपने चक्र से बाणासुर का सर काट के उसका वध कर दिया।

भादरिया माता को कुलदेवी के रूप में पूजते है ये

मृत्यु पूर्व बाणासुर ने परा-शक्ति के प्रारूप उस देवी से अपने जीवन भर के पापों के लिए क्षमा मांगी और मोक्ष की याचना करी जिस पर देवी माता ने उसकी आत्मा को मोक्ष प्रदान कर दिया। इस प्रकार देवी माँ को बाणासुर का वध करने की वजह से बायण माता, बाण माता या ब्रह्माणी माता के नाम से भी जाना जाता है।

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Haryana

समाज की ये बेटी सरकारी कर्मियों के लिये बनी मिसाल

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सैन समाज की यह एक बेटी उन तमाम सरकारी कर्मचारियों के लिये मिसाल है, जो नौकरी को केवल ड्यूटी मानते है। कोराना काल में इस बेटी ने एक साथ कई फर्ज निभाए। यह बेटी हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल है।

हरियाणा की सोनिया ओम डूलिया स्थानीय मीडिया की सुर्खियों में है। वह चंडीगढ़ निवासी है और हरियाणा पुलिस में कांस्टेबल है। लोकडाउन के दौरान उनकी ड्यूटी मनमोहन नगर स्थित राधा स्वामी सत्संग भवन में बनाये गए आश्रय स्थल पर थी। 390 प्रवासी मजदूर यहां थे। इनमें कुछ मजदूरों के साथ बच्चे भी थें।

सोनिया ने एक दिन देखा कि ये बच्चे अपनी किताबों के पन्न फाड़कर उनके हवाई जहाज बनाकर खेल रहे थे। सोनिया ने बच्चों को किताबें फाड़ने से टोका तो वे बोले, ये अब काम की नहीं है। कोरोना के चलते उनकी पढ़ाई छूट गई है। बातचीत में पता चला कि ये बच्चे चौथी से छठीं क्लास में पढ़ते थें।

बच्चों का उत्तर सोनिया के लिये आश्चर्यजनक था। उसने तय किया कि बच्चे जब तक यहां है, वे उन्हें पढ़ाएगी। फिर क्या था, क्लास शुरू हुई। सोनिया के प्यार भरे व्यवहार ने बच्चों की सोच बदल दी। बच्चे पढ़ने लगे। पिछले दिनों ये बच्चे जब यहां से गए तो सोनिया भावुक हो उठी। बच्चे भी अपनी सोनिया दीदी को याद करते हुये यहां से गए। इन बच्चों की करीब महीने भर यहां पढ़ाई हुई। इस दौरान सोशल डिस्टेंसी का पूरा ध्यान रखा गया। यहां रहते हुई बच्चों की पढ़ाई उनके लिये काफी अहम रखेगी। दरअसल, सोनिया के प्रयास ने इन बच्चों के मन में पढ़ाई को लेकर आए नकारात्मक विचारों को बदला। उनमें पढ़ने की ललक फिर से पैदा की।

सोनिया की कर्तव्य परायणता दूसरे सरकाीर कर्मचारियों के लिये प्रेरणास्रोत है। सुरक्षा की नियमित ड्यूटी के साथ डूलिया ने एक शिक्षक और दीदी की भूमिका निभाई। सोनिया ने कंप्युटर साइंस में डिग्री ले रखी है। उनके पति ओम प्रकाश डूलिया का निजी व्यवसास है।

ना गांव में है इस गोत्र की कुलदेवी का प्राचीन मंदिर

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कुलदेवी

My Kuldevi10 months ago

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